रविवार 18 अक्टूबर 2026 - 06:01
शरई अहकाम | हिजाब पर प्रतिबंध के संबंध में आयतुल्लाह सीस्तानी का महत्वपूर्ण बयान

आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली सीस्तानी ने एक इस्लामी देश के स्कूलों में छात्राओं और शिक्षिकाओं के लिए हिजाब पर प्रतिबंध लगाए जाने के संबंध में पूछे गए एक सवाल का जवाब दिया है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार, आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली सीस्तानी ने एक इस्लामी देश के स्कूलों में छात्राओं और शिक्षिकाओं के लिए हिजाब पर प्रतिबंध लगाए जाने के संबंध में पूछे गए एक सवाल का उत्तर दिया है। जिसे रूची रखने वालो के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है।

सवाल: यदि किसी इस्लामी देश में लड़कियों के स्कूलों में एक विशेष यूनिफॉर्म पहनना अनिवार्य कर दिया जाए और हिजाब करने वाली छात्राओं को स्कूल में प्रवेश करने से रोक दिया जाए। इसी तरह, हिजाब करने वाली शिक्षिकाओं को हिजाब के साथ स्कूल आने और पढ़ाने की अनुमति न दी जाए, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें उल्लेखनीय नुकसान, गंभीर कठिनाइयों और परेशानियों का सामना करना पड़े, तो ऐसी स्थिति में शरई हुक्म क्या होगा?

क्या इन महिलाओं का हुक्म उन मुस्लिम महिलाओं जैसा है, जिन्हें गैर-इस्लामी देशों में स्कूलों के भीतर हिजाब पर प्रतिबंध के कारण कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है? अर्थात, वे जहाँ तक संभव हो अपने शरई हिजाब की रक्षा करें, जैसे टोपी के माध्यम से अपने अधिकांश बालों को ढकें और गले तक बंद कपड़े पहनकर गर्दन को कुछ हद तक छिपाएँ तथा केवल आवश्यकता की सीमा तक हिजाब के अहकाम पर अमल करने से परहेज़ करें? या इस मामले में कोई अंतर है?

जवाब: यदि हिजाब छोड़ने के लिए दबाव स्वीकार करने के परिणामस्वरूप समाज पर नकारात्मक और व्यापक प्रभाव पड़ते हों, तो केवल व्यक्तिगत आवश्यकता उस दबाव को स्वीकार करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

विशेष रूप से, यदि इस कदम से समाज की सांस्कृतिक पहचान को गंभीर नुकसान पहुँचता हो और अधिकारियों को इस्लामी परंपराओं को समाप्त करने के प्रयासों में और अधिक प्रोत्साहन मिलता हो तथा वे अपनी कार्रवाइयाँ जारी रखने के लिए और अधिक साहसी हो जाते हों, तो इन सामाजिक प्रभावों को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। व इल्लल्लाहिल मुश्तका।

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